70+ जातियों पर असर डाल सकता है ST आरक्षण में ‘कोटा के अंदर कोटा’ का मामला
12% ST आरक्षण में से भील समुदाय को 9% देने की मांग, राजस्थान हाईकोर्ट ने मांगा जवाब
MOKAJI TV NEWS
राजस्थान में अनुसूचित जनजाति यानी ST आरक्षण को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी मामला सामने आया है। राजस्थान हाईकोर्ट में दायर याचिका में ST वर्ग के लिए निर्धारित 12 प्रतिशत आरक्षण के भीतर से भील समुदाय को 9 प्रतिशत विशेष उप-आरक्षण यानी सब-क्वोटा देने की मांग की गई है।
इस मांग पर राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य सरकार और संबंधित प्राधिकरणों से जवाब मांगा है। मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राजस्थान की ST सूची में शामिल अनेक समुदायों के बीच आरक्षण के लाभ के वितरण को लेकर यह बहस आगे बढ़ सकती है।
आखिर मामला क्या है?
राजस्थान में वर्तमान आरक्षण व्यवस्था के तहत ST वर्ग के लिए 12 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित है। अब याचिकाकर्ताओं की मांग है कि इस 12 प्रतिशत के भीतर से भील समुदाय के लिए 9 प्रतिशत अलग उप-कोटा निर्धारित किया जाए।
यानी प्रस्तावित व्यवस्था को सरल भाषा में ऐसे समझें—
कुल ST आरक्षण — 12%
➡️ प्रस्तावित भील उप-कोटा — 9%
➡️ शेष ST समुदायों के लिए — 3%
हालांकि, यह अभी केवल याचिका में की गई मांग है। अदालत ने इस व्यवस्था को लागू करने का आदेश नहीं दिया है। हाईकोर्ट ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।
याचिकाकर्ताओं का क्या तर्क है?
‘आदिवासी भील आरक्षण संघर्ष समिति’ से जुड़े याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ST आरक्षण का लाभ सभी जनजातीय समुदायों तक समान रूप से नहीं पहुंच रहा है।
याचिका में विशेष रूप से यह दावा किया गया है कि कुछ समुदायों को ST आरक्षण का अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिला है, जबकि भील समुदाय अभी भी सरकारी सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व हासिल नहीं कर पाया है।
याचिकाकर्ताओं ने सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन तथा सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व से जुड़े आंकड़ों की आवश्यकता पर भी सवाल उठाया है। ये याचिकाकर्ताओं के दावे हैं, अदालत द्वारा सिद्ध तथ्य नहीं।
‘कोटा के अंदर कोटा’ का मतलब क्या है?
इसे Sub-Classification या Sub-Quota कहा जाता है।
मसलन, यदि किसी बड़े आरक्षण वर्ग के अंदर कई समुदाय शामिल हैं, तो सरकार आंकड़ों के आधार पर उस वर्ग के भीतर अलग-अलग समूहों के प्रतिनिधित्व को लेकर अलग व्यवस्था करने पर विचार कर सकती है।
लेकिन ऐसा करना संवैधानिक और कानूनी सवालों से जुड़ा विषय है। सुप्रीम कोर्ट के उप-वर्गीकरण संबंधी फैसलों के बाद देश के विभिन्न राज्यों में इस विषय पर नीतिगत बहस हुई है। राजस्थान में इस मामले में अंतिम स्थिति अदालत और संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया से तय होगी।
70 से ज्यादा जातियों पर क्यों पड़ सकता है असर?
ST आरक्षण केवल एक समुदाय के लिए नहीं है। इसके दायरे में राजस्थान की अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल अनेक जनजातीय समुदाय आते हैं।
इसलिए यदि 12% के भीतर किसी एक समुदाय के लिए 9% का विशेष उप-कोटा तय होता है, तो स्वाभाविक रूप से बाकी ST समुदायों के लिए उपलब्ध हिस्से के वितरण पर प्रश्न उठेंगे।
यही वजह है कि यह मामला केवल भील समुदाय तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि ST सूची में शामिल अन्य समुदायों के प्रतिनिधित्व और आरक्षण लाभ के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है।
क्या इससे जातीय संघर्ष हो सकता है?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इस मामले से निश्चित रूप से जातीय संघर्ष होगा।
लेकिन आरक्षण का मुद्दा राजस्थान में सामाजिक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है। यदि अलग-अलग समुदाय अपने हिस्से, प्रतिनिधित्व और आरक्षण लाभ को लेकर आमने-सामने आते हैं, तो सामाजिक तनाव की संभावना पर सार्वजनिक चर्चा होना स्वाभाविक है।
इसलिए इस पूरे विषय में आंकड़े, संवैधानिक प्रावधान, न्यायालय का निर्णय और सभी संबंधित समुदायों के पक्ष महत्वपूर्ण होंगे।
एक बड़ा सवाल—क्या सरकार के पास पर्याप्त आंकड़े हैं?
याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि भील समुदाय के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन तथा सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व को लेकर पर्याप्त और अद्यतन आंकड़े उपलब्ध हैं या नहीं।
याचिकाकर्ताओं ने पुराने जनगणना आंकड़ों और नए व्यापक सर्वेक्षण की आवश्यकता का मुद्दा भी उठाया है। यह भी अदालत के सामने विचाराधीन विषय है।
हाईकोर्ट ने क्या किया?
राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस याचिका पर संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
रिपोर्टों के अनुसार नोटिस राज्य सरकार के संबंधित अधिकारियों, अनुसूचित जनजाति आयोग और केंद्र सरकार से जुड़े पक्षों को दिया गया है।
याचिकाकर्ताओं ने ST आरक्षण के तहत होने वाली नई नियुक्तियों पर मामले के निर्णय तक रोक लगाने की मांग भी की है। इस मांग पर अंतिम स्थिति अदालत की कार्यवाही से स्पष्ट होगी।
अब आगे क्या होगा?
मामले में मुख्य रूप से इन सवालों पर ध्यान रहेगा—
क्या ST आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण कानूनी रूप से किया जा सकता है?
भील समुदाय के लिए 9% उप-कोटे की मांग के समर्थन में पर्याप्त आंकड़े हैं या नहीं?
ST सूची के अन्य समुदायों पर इसका प्रभाव क्या होगा?
वर्तमान ST आरक्षण व्यवस्था में प्रतिनिधित्व का वास्तविक आंकड़ा क्या है?
राज्य सरकार और केंद्र सरकार इस मांग पर क्या जवाब देते हैं?
राजस्थान हाईकोर्ट आगे क्या आदेश देता है?
आवश्यकता पड़ने पर मामला आगे उच्चतम न्यायालय तक जाता है या नहीं?
MOKAJI TV का निष्कर्ष
यह मामला अभी निर्णय नहीं बल्कि न्यायिक विचाराधीन प्रक्रिया में है।
एक तरफ भील समुदाय की ओर से आरक्षण के लाभ में पर्याप्त प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की मांग सामने आई है।
दूसरी तरफ, यदि ST के 12% आरक्षण के भीतर 9% का विशेष उप-कोटा प्रस्तावित होता है, तो ST वर्ग में शामिल अन्य समुदायों के हिस्से और प्रतिनिधित्व को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल उठेंगे।
इसलिए इस पूरे विवाद का समाधान भावनाओं या आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधानों, विश्वसनीय सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों और न्यायालय के अंतिम निर्णय के आधार पर होना महत्वपूर्ण होगा।
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Author: MOTI SINGH RATHORE
EDITOR IN CHIEF "MOKAJI TV"








