राजस्थान के 14 जिलों की 80 तहसीलों को अकाल प्रभावित घोषित किया गया है।

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राजस्थान की 80 तहसीलों में अकाल घोषित, 69 गंभीर और 11 मध्यम श्रेणी में; किसानों और पशुपालकों को राहत की उम्मीद

जयपुर, 26 अक्टूबर 2026।

राजस्थान में कम मानसूनी बारिश, जल स्रोतों में घटते जलस्तर और खरीफ फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव को देखते हुए राज्य सरकार ने बड़ा निर्णय लिया है। प्रदेश के 14 जिलों की 80 तहसीलों को अकाल प्रभावित घोषित किया गया है। आपदा प्रबंधन, सहायता एवं नागरिक सुरक्षा विभाग की ओर से 24 और 25 अक्टूबर को जारी अधिसूचनाओं के अनुसार, प्रभावित तहसीलों में 69 को गंभीर तथा 11 को मध्यम अकाल प्रभावित श्रेणी में रखा गया है। यह घोषणा अधिसूचना प्रकाशित होने की तारीख से छह महीने तक प्रभावी रहेगी।

इस फैसले से प्रभावित क्षेत्रों के किसानों, पशुपालकों और ग्रामीण परिवारों को राहत मिलने की उम्मीद है। अब सबसे बड़ी चुनौती सरकारी घोषणाओं को धरातल पर लागू करने और जरूरतमंद लोगों तक समय पर सहायता पहुँचाने की है।

राजस्थान में अकाल की स्थिति क्यों बनी?

राजस्थान के कई क्षेत्रों में इस मानसून सीजन के दौरान सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। इसका असर खेतों में खड़ी फसलों, ग्रामीण जल स्रोतों और पशुओं के लिए उपलब्ध चारे पर पड़ा है।

राज्य के जल संसाधन विभाग के 30 सितंबर के आँकड़ों के अनुसार, 1 जून से 30 सितंबर 2026 के बीच राजस्थान में 350.83 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य वर्षा 424.71 मिलीमीटर थी। इस प्रकार प्रदेश में सामान्य से लगभग 17.4 प्रतिशत कम बारिश हुई।

इसके अतिरिक्त, जलाशयों में पानी का भंडारण भी पिछले वर्ष की तुलना में कम दर्ज किया गया। इन परिस्थितियों ने कृषि और पशुपालन पर निर्भर ग्रामीण परिवारों की चिंताएँ बढ़ा दी हैं।

किन जिलों की तहसीलें अकाल प्रभावित घोषित हुईं?

सरकारी अधिसूचनाओं के आधार पर राजस्थान के निम्नलिखित 14 जिलों की तहसीलें अकाल प्रभावित घोषित की गई हैं:

  1. जोधपुर
  2. बाड़मेर
  3. जालोर
  4. बालोतरा
  5. पाली
  6. फलोदी
  7. जैसलमेर
  8. डूंगरपुर
  9. बांसवाड़ा
  10. चूरू
  11. ब्यावर
  12. बीकानेर
  13. नागौर
  14. सिरोही

इन जिलों में अकाल की गंभीरता एक समान नहीं है। कुछ तहसीलों को गंभीर और कुछ को मध्यम श्रेणी में रखा गया है। प्रभावित तहसीलों की संख्या के मामले में जोधपुर, बाड़मेर और जालोर प्रमुख रूप से सामने आए हैं।

किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती: फसल खराबा और आर्थिक संकट

कम बारिश के कारण किसानों की खरीफ फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। जिन क्षेत्रों में पर्याप्त नमी उपलब्ध नहीं रही, वहाँ फसलों की वृद्धि, उत्पादन और गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका है।

खेती की लागत पहले ही किसानों पर आर्थिक दबाव डालती है। बीज, खाद, डीजल, सिंचाई और कृषि उपकरणों पर खर्च करने के बाद यदि फसल से पर्याप्त उत्पादन नहीं मिलता, तो किसान के लिए अगली फसल की तैयारी करना भी कठिन हो सकता है।

ऐसे में प्रभावित किसानों के लिए जरूरी है कि प्रशासन खेतों का वास्तविक सर्वेक्षण करे और नुकसान के आकलन के आधार पर पात्र किसानों को लागू सरकारी नियमों के अनुसार राहत उपलब्ध कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ाए।

किसानों को यह भी जानकारी दी जानी चाहिए कि फसल बीमा, कृषि इनपुट सहायता और अन्य राहत योजनाओं के अंतर्गत आवेदन कैसे किया जा सकता है तथा इसके लिए किन दस्तावेजों की आवश्यकता होगी।

पशुपालकों की सबसे बड़ी चिंता: पशुओं के लिए चारा और पानी

राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में गाय, भैंस, भेड़, बकरी और ऊँट सहित अनेक पशु परिवारों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार हैं।

अकाल के दौरान खेतों में चारा कम होने और पानी के स्रोतों पर दबाव बढ़ने से पशुपालकों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। पर्याप्त चारा और पानी नहीं मिलने पर पशुओं के स्वास्थ्य, दूध उत्पादन और पशुपालकों की आय पर असर पड़ सकता है।

इसलिए प्रभावित क्षेत्रों में निम्नलिखित कदम प्राथमिकता के आधार पर उठाए जाने की जरूरत है:

  • जरूरतमंद पशुपालकों के लिए रियायती दरों पर चारे की व्यवस्था।
  • चारा डिपो की स्थापना और नियमित आपूर्ति।
  • अत्यधिक प्रभावित गाँवों में पशुओं के लिए पानी की उपलब्धता।
  • आवश्यकतानुसार पशु शिविरों की व्यवस्था।
  • पशुओं के स्वास्थ्य की जाँच और पशु चिकित्सा सेवाएँ।
  • छोटे और सीमांत पशुपालकों को सरकारी सहायता योजनाओं की जानकारी।

बाड़मेर जिले में प्रशासन ने पहले चरण में 10 चारा डिपो के माध्यम से पात्र पशुपालकों को रियायती दरों पर चारा उपलब्ध कराने की मंजूरी दी है। यह कदम प्रभावित क्षेत्रों में पशुधन को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण है। अन्य प्रभावित क्षेत्रों में भी स्थानीय जरूरतों के अनुसार व्यवस्था की आवश्यकता है।

गाँवों में पेयजल की व्यवस्था सबसे जरूरी

अकाल का प्रभाव केवल खेती तक सीमित नहीं रहता। ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की उपलब्धता भी एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

कई गाँवों और ढाणियों में लोग अपने दैनिक उपयोग के लिए स्थानीय कुओं, ट्यूबवेल, टांकों और अन्य जल स्रोतों पर निर्भर रहते हैं। भूजल स्तर गिरने या जल स्रोतों में पर्याप्त पानी नहीं रहने पर ग्रामीण परिवारों को दूर से पानी लाना पड़ सकता है।

ऐसी परिस्थितियों में प्रशासन को प्रभावित गाँवों की पहचान करके पेयजल आपूर्ति की नियमित निगरानी करनी चाहिए।

जहाँ सामान्य जलापूर्ति पर्याप्त नहीं है, वहाँ जरूरत के अनुसार टैंकरों से पानी पहुँचाने, खराब हैंडपंपों की मरम्मत करने और उपलब्ध जल स्रोतों का उचित प्रबंधन करने की आवश्यकता है।

पेयजल की व्यवस्था करते समय मनुष्यों के साथ पशुओं की जरूरतों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।

सरकार और जिला प्रशासन से क्या अपेक्षाएँ हैं?

अकाल प्रभावित घोषित होने के बाद अब किसानों और पशुपालकों की निगाहें राहत कार्यों पर हैं।

प्रभावित क्षेत्रों में राहत को प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित कार्य महत्वपूर्ण हैं:

1. फसल खराबे का सर्वेक्षण: खेतों में हुए नुकसान का निष्पक्ष आकलन करके पात्र किसानों की पहचान की जाए।

2. राहत सहायता: लागू नियमों और पात्रता के अनुसार किसानों को समय पर आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया तेज की जाए।

3. चारा डिपो: जरूरत के आधार पर प्रभावित गाँवों और तहसीलों में चारा डिपो खोले जाएँ।

4. पेयजल आपूर्ति: जल संकट वाले गाँवों और ढाणियों में नियमित पेयजल व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

5. पशु संरक्षण: आवश्यकतानुसार पशु शिविर, पशु चिकित्सा और चारे-पानी की व्यवस्था की जाए।

6. रोजगार के अवसर: पात्र ग्रामीण परिवारों को लागू ग्रामीण रोजगार योजनाओं के अंतर्गत काम उपलब्ध कराने की संभावनाओं पर ध्यान दिया जाए।

7. पारदर्शिता और निगरानी: राहत योजनाओं की जानकारी सार्वजनिक की जाए और शिकायतों के समाधान के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि अकाल की घोषणा से अपने आप सभी प्रकार की आर्थिक सहायता या मुफ्त चारा-पानी मिलने की गारंटी नहीं होती। सहायता का स्वरूप संबंधित सरकारी आदेशों, योजनाओं और पात्रता के नियमों पर निर्भर करेगा।

ग्रामीण परिवारों के लिए आगे की राह

राजस्थान में खेती और पशुपालन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। फसल खराब होने पर खेतों से मिलने वाला चारा कम हो जाता है और पशुपालन की लागत बढ़ सकती है। इसका असर दूध उत्पादन, पशुओं की देखभाल और ग्रामीण परिवारों की आय पर पड़ता है।

यदि राहत कार्य समय पर नहीं पहुँचते, तो कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों के सामने कर्ज लेने, पशु बेचने या रोजगार की तलाश में दूसरे क्षेत्रों में जाने जैसी परिस्थितियाँ पैदा हो सकती हैं।

इसलिए राहत व्यवस्था में छोटे और सीमांत किसानों, भूमिहीन पशुपालकों तथा दूरस्थ ढाणियों में रहने वाले परिवारों की जरूरतों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

MOKAJI TV का जनहित संदेश

अकाल प्रभावित क्षेत्रों में किसानों और पशुपालकों की समस्याओं को प्राथमिकता से सुना जाना चाहिए। सरकारी घोषणाओं के साथ-साथ राहत कार्यों की वास्तविक स्थिति की निगरानी भी जरूरी है।

ग्राम पंचायतों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों, सहकारी समितियों और जिला प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय से जरूरतमंद परिवारों तक सहायता पहुँचाने में मदद मिल सकती है।

MOKAJI TV प्रशासन से अपील करता है कि प्रभावित क्षेत्रों में फसल नुकसान के आकलन, पेयजल आपूर्ति, पशुओं के लिए चारा-पानी और पात्र परिवारों को राहत उपलब्ध कराने के कार्यों को प्राथमिकता दी जाए।

किसानों और पशुपालकों की समस्याओं का समाधान केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं होना चाहिए। ग्रामीण आजीविका, पशुधन संरक्षण और सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता भी राहत व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

MOKAJI TV की बात — आपके साथ।

MOTI SINGH RATHORE
Author: MOTI SINGH RATHORE

EDITOR IN CHIEF "MOKAJI TV"

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